Hindi Story on Plastice Disadvantage For Earth | Best Moral Story in Hindi For Class 8+

Hindi Story on Plastice Disadvantage For Earth | Best Moral Story in Hindi: Best Moral Story in Hindi: प्रस्तुत पाठ हमें अवगत कराता है कि हमारी रोज़मर्रा की जीवन शैली में प्लास्टिक का प्रयोग इस हद तक शामिल हो गया है कि अब उससे बच पाना नामुमकिन है । यह जितना उपयोगी है , उतना नुकसानदेह भी साबित हो रहा है । यह एक तरफ पर्यावरण को गंभीर चुनौती दे रहा है । दूसरी तरफ नव जीवन देने में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है । 

Plastice Disadvantage For Earth

बारिश के कारण 2009 में मुंबई में जो तबाही मची थी , उसके लिए काफ़ी हद तक पॉलिथीन से अँटी पड़ी नालियाँ और नाले ज़िम्मेदार थे । क्या इंसानों और जीवों के जीवनदायी नदी , झील , तालाब , समुद्र प्लास्टिक के कचरे को ढोने वाले बनकर ही रह जाएँगे ? सस्ता , हलका , टिकाऊ , मज़बूत , कम जगह घेरने वाला , लोचदार , हर तरह के सामान को ले जा सकने वाला , तापरोधी जैसी विशेषताओं के साथ प्लास्टिक एक बहुउपयोगी और बहुउद्देशीय वस्तु की तरह ज़हन में आता है । 

फिर ऐसा क्या है कि पूरी दुनिया में इस बहु उपयोगी चीज़ के प्रति लोगों , संस्थाओं , व्यवस्थाओं का गुस्सा फूट रहा है । असल में बहु उपयोगिता प्लास्टिक का एक पक्ष है जो कि बहुत खूबसूरत है । लेकिन प्लास्टिक दूसरा पक्ष यह कि यह पर्यावरण के लिए खतरनाक है और इसके निर्माण में प्रयोग होने वाले कई जहरीले रसायन इंसानों के लिए कम – से – कम एक हज़ार साल लेती है । मतलब कि एक व्यक्ति की कम – से – कम दस पीढ़ियाँ एक पॉलिथीन को बरत सकती हैं , यदि वह ना फटे तो ! 

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जो पैदा हुआ है वह शीघ्र ही खत्म हो जाएगा । ताकि फिर किसी दूसरे को नया जन्म असल में विज्ञान ने यह एक ऐसी चीज़ पैदा की है जो प्रकृति के नियम के विरुद्ध काम करती है । प्रकृति का नियम है जन्म , विकास और मृत्यु । मिले , लेकिन प्लास्टिक अपनी बहु – उपयोगिता के कारण निरंतर नए – नए रूप में जन्म तो ले रही है , पर खत्म नहीं हो रही । 

प्लास्टिक का इतने लंबे समय तक न गलना सबसे बड़ी परेशानी का कारण है । इसे न ही जलाया जा सकता है , क्योंकि इसे जलाने से ज़हरीले तत्व हवा में घुलते हैं । प्लास्टिक का यह लगभग ‘ अमर रूप ‘ न सिर्फ इंसानों के जीवन को संकट में डाल रहा है , बल्कि जानवरों को भी मौत के घाट उतार रहा है । डॉल्फिन , व्हेल , पेंग्विन जैसे लगभग एक लाख समुद्री जीव हर साल प्लास्टिक खाने से मर रहे हैं ।

 भारत में सिर्फ उत्तर प्रदेश में सौ गायें प्रतिदिन पॉलिथीन खाने से मरती हैं । ऐसी ही एक गाय के पेट में 35 किलो प्लास्टिक पाई गई थी । यह पॉलिथीन महानगरों में ‘ नकली बाढ़ ‘ का भी प्रमुख कारण बनती है । प्लास्टिक का एक और बेहद खतरनाक रूप प्लास्टिक के खिलौनों और बच्चों के प्लास्टिक के सामान के रूप में सामने आ रहा है । थैलेट्स नामक एक ज़हरीला रसायन प्लास्टिक के खिलौनों को नरम और मुलायम बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है । 

शोध में पता चला है कि इस रसायन के इस्तेमाल से बने खिलौने प्रयोग करने पर असमय जन्म , समय पूर्व प्रौढ़ता , दाँतों संबंधी बीमारी या फिर मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव की आशंका काफी बढ़ जाती हैं । जर्मनी के गुटनबर्ग विश्वविद्यालय के एक शोध में सामने आया है कि बच्चों के लिए बनने वाला प्लास्टिक खासतौर से दूध की बॉटल , निप्पल , तरल चीजें पीने वाले कप में बीपीए नामक खतरनाक रसायन पाया जाता है जो कि बच्चों के मस्तिष्क विकास में बाधा डालता है । 

प्लास्टिक के प्रयोग को कम करने के लिए दुनिया भर में कोशिशें चल रही हैं । एशिया में बांग्लादेश पहला देश था , जिसने 2002 में प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध लगाया था । 2002 में डब्लिन में प्लास्टिक बैग पर कर लगाकर इसके प्रयोग को 95 फीसदी तक कम किया है । 

2009 में अमेरिका ने भी प्लास्टिक के नरम खिलौनों पर प्रतिबंध लगाया । इसी प्रकार यूरोपीय संघ और डेनमार्क ने भी अनुत्पाद रसायनों से बनी बच्चों की दूध की बोतलों को प्रतिबंधित किया । इसी कड़ी में भारत में भी पॉलीथीन के निर्माण , प्रयोग और वितरण पर प्रतिबंध लगाया गया । 

लेकिन राजस्थान और असम जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर बाकी जगहों पर अभी भी धड़ल्ले से पॉलिथीन का प्रयोग जारी है । हम अपने सुविधाजनक वर्तमान के लिए भविष्य को भयावहता की तरफ धकेल रहे हैं । न गलने , सड़ने वाले प्लास्टिक के स्वस्थ विकल्प के तौर पर ( फोटो डिग्रेडेबल ) सूर्य की रोशनी में गलने वाले ( बायोडिग्रेडेबल ) जैविक रूप से सड़ने वाले और रासायनिक रूप से गलाकर दोबारा प्रयोग में लाए जा सकने वाले पॉलिथीन के सफल प्रयोग तो हो चुके हैं , लेकिन इस पर्यावरण अनुकूल पॉलिथीन की निर्माण लागत अभी बहुत ज्यादा है । 

सूर्य के प्रकाश से खत्म होने वाली पॉलिथीन की उम्र एक से तीन वर्ष है । सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आते ही यह धीरे – धीरे भुरभुरी होकर मिट्टी में मिल जाती है । कागज़ , जूट , कपड़े के थैले पॉलिथीन का अच्छा विकल्प हो सकते हैं । लेकिन अभी भी इन विकल्पों पर ज्यादा संजीदा तरीके से ध्यान नहीं दिया जा रहा है । जब तक सूर्य की रोशनी में गलने वाले , जैविक रूप से गलने वाले पॉलिथीन का चलन बढ़ेगा , तब तक पता नहीं पृथ्वी के कितने जीव प्लास्टिक बैग की बलि चढ़ चुके होंगे ।

अलेगजेंडर पार्वस ने 1862 में लंदन में एक प्रदर्शनी में पहली बार मानव निर्मित प्लास्टिक का प्रदर्शन किया था । इस खोज के साथ ही प्लास्टिक पर इंसान की अंतहीन निर्भरता के युग की शुरूआत हुई । आज तेल , मसालों , सब्जी , कपड़ों , किताबों , दवाइयों से लेकर अन्य तमाम ज़रूरी चीज़ो तक एक भी सामान ऐसा नहीं है , जो प्लास्टिक की थैली में न आता हो । 

बाहर से देखने पर लगता है कि बिल्डिंग निर्माण कार्य में सिर्फ सीमेंट , ईंट , लोहा , स्टील , रेत , बजरी का प्रयोग होता है , लेकिन वास्तविकता यह है कि इमारत निर्माण क्षेत्र , प्लास्टिक के प्रयोग में तीसरे नंबर पर है । प्लास्टिक के जोड़ , पाइप , बिजली के तार , खिड़की के फ्रेम , दरवाजे , यहाँ तक कि घर की आंतरिक साज – सज्जा में भी प्लास्टिक का इस्तेमाल खूब होने लगा है । 

इमारत और निर्माण कार्य में प्लास्टिक के प्रयोग के कई कारण हैं . जैसे- प्लास्टिक का तुलनात्मक रूप से सस्ता होना , फिटिंग में आसानी , सरदी – गरमी के बेहतर प्रतिरोधी , ऊर्जा का सेवक और साथ ही ध्वनि प्रदूषण कम करने वाला है । परिवहन के क्षेत्र में भी प्लास्टिक ने अपना परचम लहराया है । 

हवाई जहाज़ , रेलगाड़ी , बस , कार , दुपहिया , नाव आदि हर कहीं प्लास्टिक का प्रयोग आराम और सुविधा के लिए और किफायती होने के कारण किया जाता है । थर्मोप्लास्टिक से बनी कारों को बनाने के लिए प्रयोग चल रहे हैं । बिजली और इलेक्ट्रॉनिक चीज़ों के लिए प्लास्टिक एक बुनियादी चीज़ है । 

बिजली के तारों से लेकर , मोबाइल फोन , डीवीडी प्लेयर के साथ – साथ लगभग सभी आधुनिक उपकरणों के महत्वपूर्ण भाग प्लास्टिक से ही बनाए जाते हैं । प्लास्टिक का लोचदार और हलका होना इसकी बहुत बड़ी खासियत है , जिस कारण यह बहु उपयोगी है । यहाँ तक कि खेती – बाड़ी भी प्लास्टिक के प्रयोग से अछूते नहीं रहे हैं । प्लास्टिक के पाइपों से होने वाली सिंचाई ने न सिर्फ मानसून पर से खेती की निर्भरता को कम किया है , बल्कि रेतीली और बंजर जमीनों में भी फसलें लहलहाने में मदद की है । 

प्लास्टिक के पाइपों से होने वाली सिंचाई ने काफी हद तक खेती में होने वाली पानी की बेतहाशा खपत को भी नियंत्रित किया है । इस तकनीक में पौधों या फसल को सिर्फ उतना ही पानी मिलता है , जितना की उसके उगने और बढ़ने के लिए ज़रूरी है ।

 चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्लास्टिक ने क्रांतिकारी तरीके से पूरी मानव जाति की मदद की है । सिर्फ एक बार प्रयोग की जाने वाली इंजेक्शन की सूइयाँ , खून की थैलियाँ , ग्लूकोज़ की बोतलें , दवाई की शीशियाँ , दिल में लगने वाली वॉल्व , सुनने वाली मशीन से लेकर कृत्रिम अंगों तक बार – बार प्लास्टिक एक जीवन रक्षक की तरह इंसानों के जीवन में आती है । 

विकलांग चिकित्सा संबंधी प्लास्टिक के उपकरण शरीर के भीतर आरोपित होकर इंसानों को कई तरह की विकलांगता का शिकार होने से बचाते हैं । यहाँ तक कि सिलिकोन से बना नकली कार्निया किसी इंसान की प्राकृतिक दृष्टि को लौटा सकता है , जिसका कॉर्निया नष्ट हो चुका हो । चिकित्सा के क्षेत्र में सर्जरी ने दुर्घटना का शिकार हुए लोगों की अविश्वसनीय तरीके से मदद की । 

यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्लास्टिक सर्जरी बहुत सारे लोगों की ज़िंदगी में एक दूसरा भगवान बनकर आई है । प्लास्टिक सर्जरी का प्रयोग सौंदर्य प्रसाधन के तौर पर नहीं किया जाता है । हाँ ! प्लास्टिक सर्जरी का उपयोग सौंदर्यवर्धक प्रसाधन के तौर पर किया ज़रूर जाता है । 

प्लास्टिक सर्जरी का प्रयोग शल्य चिकित्सा , जले हुए का इलाज करने और सूक्ष्म शल्य चिकित्सा में किया जाता है । चिकित्सा क्षेत्र में प्लास्टिक का सबसे नया और अविश्वसनीय योगदान है— ‘ प्लास्टिक खून ‘ का निर्माण । यह प्लास्टिक खून प्लास्टिक के अणुओं से बनता है , जिसमें लौह अणु है , जो कि लाल रक्त कोशिकाओं की तरह शरीर में ऑक्सीजन ले जाने का काम करेगा । 

वैज्ञानिकों का कहना है कि ये प्लास्टिक खून , एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए हलका है , ज्यादा समय तक चलता है और उसे ठंडी जगह में रखने की ज़रूरत भी नहीं है । साथ ही इस खून के एच ० आई ० वी ० से मुक्त होने की सौ प्रतिशत गारंटी है । 

Conclusion

प्लास्टिक की इतनी व्यापकता को देखकर सहज ही उस पर इंसान की निर्भरता का अंदाजा लगाया जा सकता है । प्लास्टिक के इतने दैवीय रूप देखने के बाद प्लास्टिक एक जीवरक्षक मित्र की तरह सामने आती है , जो कि जब , जहाँ , जैसे भी इंसानी ज़रूरत के मुताबिक ढल जो जाती है ।

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