Hindi Story: किसान की कहानी In hindi | Best Moral story In Hindi 2022

Hindi Story: प्रस्तुत कहानी एक सामान्य किसान की कहानी हैं , जो प्राण गँवा बैठता है । लेखक कहानी के माध्यम से लालच न करने तथा संतुष्ट रहने की सीख दी है । जीवन में कमाया धन – दौलत मनुष्य अपने साथ नहीं ले जा सकता । अतः इन भौतिक वस्तुओं का लालच नहीं करना चाहिए । 

Best Moral story In Hindi – किसान की कहानी 

प्राचीन काल की बात है । दो बहनें थीं । बड़ी बहन का विवाह एक सौदागर के साथ तथा छोटी बहन का विवाह एक किसान के साथ हुआ । एक बार की बात है । बड़ी बहन अपनी छोटी बहन के घर गई । दोनों आपस में बातें कर रही थीं । बड़ी बहन बोली ” हमारा जीवन तो बहुत सुखमय है । हम लोग शहर में आराम से रहते हैं । 

अच्छा खाते हैं , अच्छा पहनते हैं , सैर- सपाटे , तमाशे – थियेटर में हमारा समय बीतता है । ” छोटी बहन को अपनी बड़ी बहन की बातें | बिलकुल अच्छी नहीं लगी । 

वह बोली , ” तुम लोग केवल सजी – धजी रहती हो , आमदनी अधिक है , लेकिन एक दिन सब हवा हो जाए तो । जीजी ! हम लोग तो सीधा – सादा जीवन व्यतीत करते हैं । 

हमें किसी प्रकार की चिंता नहीं रहती ।

 ” बड़ी बहन ताना मारते हुए बोली , ” तुमने , जीवन के सुख और आनंद को भोगा ही कहाँ है ? तुम्हारी ज़िंदगी भी कोई जिंदगी है । पेट तो जानवर भी भर लेता है । 

Hindi Story
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” छोटी बहन का पति दीना उन दोनों बहनों की बातें सुन रहा था । उसने सोचा , बात तो सही है । बचपन से धरती माँ की सेवा में जुटे रहे । कभी किसी चीज़ की परवाह नहीं की । हमारे पास भी ज़मीन होती , तो अच्छा रहता ।

तभी किसी ज़मींदार की ज़मीन बिकने लगी । दीना ने चालीस एकड़ ज़मीन का एक टुकड़ा खरीद लिया । वह उस जमीन पर फसलें उगाता , फलो के पेड़ लगाता । अपनी फसल को देखकर वह खुशी से फूला न समाता । अब दीना काफी खुश था , लेकिन उसे एक बात की तकलीफ थी कि पड़ोसियों के मवेशी उसके खेतों में घुस जाते | और फसलें चर लेते थे । 

काफी दिन तक दीना इन बातों को सहन करता रहा । पड़ोसियों को भी समझाता रहा , लेकिन एक दिन तंग आकर उसने अदालत में अर्जी दे दी । कई किसानों पर जुर्माना हो गया । अब तो पड़ोसी भी उससे ईर्ष्या करने लगे । क . उन्हीं दिनों सतलुज के पार एक नई बस्ती बसने लगी । वहाँ जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बीस एकड़ ज़मीन मुफ्त में मिल रही थी । यह खबर जब दीना के कानों तक पहुँची तो उसने सोचा , ‘ मेरे पड़ोसी मुझे परेशान करते हैं अगर मैं भी | 

वहाँ ज़मीन ले लूँ , तो ठीक रहेगा । ‘ उसने एक परदेसी किसान से उस ज़मीन के बारे में पता लगाया , तो पता चला कि ज़मीन बहुत उपजाऊ है । अब दीना ने मन ही मन वहाँ जाने का फैसला कर लिया । वह अपने परिवार को लेकर सतलुज पार चला गया ।

 वहाँ के गाँव की पंचायत में शामिल होने के लिए उसने अर्ज़ी दे दी । उसे ज़मीन मिल गई अपने लिए भी और बाल – बच्चों के इस्तेमाल के लिए भी । ₹ . दीना अब पहले से बहुत अधिक खुश था क्योंकि अब उसके पास ज़मीन थी , घर था , ढेर सारे मवेशी थे तथा उन्हें चराने के लिए खुला मैदान भी था । 

कुछ दिन तक तो सब ठीक – ठाक चलता रहा । वह अपने घर – परिवार और मवेशियों से संतुष्ट था , लेकिन धीरे धीरे उसकी इच्छा बढ़ने लगी । अब उसे अपनी ज़मीन कम लगने लगी । एक दिन की बात है , एक सौदागर वहाँ आया । अपने घोड़े के चारे – पानी के लिए थोड़ी देर वहाँ ठहरा । बातों ही बातों में उसने दीना को बताया कि वह नदी के पार से आ रहा है , वहाँ इतनी अधिक ज़मीन है कि महीनो चलते रहो , फिर भी नाप न पाओ । यह सुनकर दीना ने मन ही मन निश्चय किया कि मुझे वहाँ जाकर ज़रूर देखना चाहिए । 

दीना ने एक आदमी को अपने साथ लिया और सौदागर के बताए स्थान की ओर चल पड़ा । रास्ते में उसने खाने – पीने का सामान , उपहार और मिठाई भी खरीदी । सात दिन का सफर तय करके वे दोनों उस स्थान पर पहुँचे । दीना ने देखा कि सौदागर ने ठीक बताया था , वहाँ कोल लोगों की बस्ती थी । दरिया के पास ज़मीन ही ज़मीन थी । सारी ज़मीन खाली पड़ी हुई थी । 

ज़मीन भी काफी अच्छी दिखाई दे रही थी । कोल लोग उस ज़मीन का प्रयोग नहीं करते थे । केवल मवेशी पालते और शिकार करते थे । दीना को देखकर कोल लोग अपने तंबुओं से बाहर निकल आए । सभी उत्सुकता से दीना की ओर देख रहे थे । एक दुभाषिए की सहायता से दीना ने उन्हें समझाया कि वह ज़मीन के लिए वहाँ आया है । वे सब दीना की बातें सुनकर बहुत प्रसन्न हुए । वे दीना को अपने साथ डेरे पर ले गए और उसका खूब स्वागत सत्कार किया । कुछ देर बाद कोलों का सरदार दीना से मिलने के लिए आया । 

सभी लोग अपने सरदार के स्वागत के लिए चुपचाप खड़े हो गए । दीना ने समझ लिया कि यह कोलों का सरदार है । अपने दुभाषिए की ओर देखा । दुभाषिए ने बताया कि यह कोलों का सरदार है । दीना ने तुरंत एक बढ़िया कपड़ा , चाय का डिब्बा और मिठाइयाँ सरदार को भेट में दीं । भेंट पाकर सरदार मन – ही – मन मुसकराया और बैठ गया ।रात्रि में दीना के स्वागत में दावतें हुईं । बातों ही बातों में दोना ने सरदार से अपने आने का प्रयोजन बताया । 

उस सरदार से कहा , ” मैं चाहता हूँ कि ज़मीन के कागज़ भी पक्के बन जाएँ । 

” सरदार ने कहा , ” इस काम में क मुश्किल नहीं होगी क्योंकि उनका मुंशी कस्बे में जाकर लिखा पढ़ी करके कागज़ बना देगा । ” दीना ने सरदार ज़मीन का दाम पूछा । 

सरदार ने बताया , ” हमारी जमीन का एक ही दाम है , एक दिन का एक हजार रुपया ।

 ” “ एक दिन के एक हज़ार रुपये ! यह हिसाब तो मेरी समझ में नहीं आ रहा है । ये बताएं कि कितने रुपये में कितने एकड़ ज़मीन मिलेगी ? 

” सरदार मुसकराकर बोला , ” हमारे यहाँ ऐसा ही हिसाब है । दिन भर में पैदल चलकर जितनी ज़मीन नाप लोगे , वह तुम्हारी होगी । कीमत केवल एक हज़ार रुपया ।

 ” यह सुनकर दीना मन ही मन बहुत खु हो गया । सरदार फिर बोला , ” हमारी केवल एक शर्त है । ” ” शर्त ! कैसी शर्त ? ” दीना ने हैरानी से पूछा ।

 ” जिस जग से तुम चलोगे , सूरज ढलने के पहले तुम्हें उसी जगह पर वापस लौटना होगा । यदि तुम सूरज ढलने के पहले वापर नहीं आ सकोगे , तो तुम्हारे पैसे तुम्हें वापस नहीं किए जाएंगे ।

 ” दीना ने कहा , ” मुझे शर्त मंजूर है । ” रात में दीना बिस्तर पर लेटा , तो उसे नींद नहीं आ रही थी । वह अगले दिन की कल्पनाओं में खो गया । वह सोच लगा । 

दिन भर में साठ किलोमीटर ज़मीन तो बड़ी आसानी से चल लूँगा क्योंकि आजकल तो दिन भी लंबे होते है अच्छी किस्म की ज़मीन पर खेती करूंगा और घटिया ज़मीन बेच दूंगा । 

कुछ ज़मीन बटाई पर दे दूंगा । कुछ बै खरीद लूँगा । दो – चार नौकर – चाकर भी रखने पड़ेंगे । फिर क्या , देखते – देखते मेरे दिन भी बदल जाएँगे । 

सुबह होते ही दीना जाग गया । उसने अपने साथी को जगाया । फिर वे दोनों कोल के पास पहुँच गए । दीना ने कोली – कहा , ” सूरज निकल आया है । अब हमें चल देना चाहिए । 

” कोलो ने दीना को चाय पीने के लिए कहा , लेकिन देर हो जाए इस खयाल से दीना ने चाय पीने से इंकार कर दिया । इतने में सरदार भी वहाँ आ गया । सब टेकड़ी ( ऊँ ज़मीन ) की ओर बढ़े । 

सरदार ने दूर – दूर तक फैली ज़मीन की ओर इशारा करके कहा , ” जहाँ तक तुम्हारी निगा पहुँच रही है , वो सब हमारी ज़मीन है । इसमें से जितना चाहो ले लो । ” ज़मीन देखकर दीना की आँखें चमकने लगी । 

सरदार ने सिर की टोपी उतारकर ज़मीन पर रख दी और कहा , निशान हैं , यहाँ से चलकर सूर्य डूबने के पहले तुम्हें यहीं वापस आना है । 

” दीना ने सिर हिलाया । रुपये सरदार की टोपी में रख दिए और स्वयं रोटी , पानी और फावड़ा लेकन चलने को तैय हो गया । उसने एक नज़र चारों तरफ घुमाई । हर तरफ उसे अच्छी ज़मीन ही दिखाई पड़ रही थी । उसने पूर्व की अ चलने का निश्चय किया । 

दीना ने लंबे – लंबे कदम बढ़ाने आरंभ कर दिए । एक हज़ार मीटर चलने पर उसने फावड़े द गड्ढा बनाया और ऊँची घास चिन दी । अब उसके बदन में फुर्ती आ गई । तेज़ चाल से चलते किया । अब सूरज की गरमी बढ़ने लगी , उसे भूख महसूस होने लगी । 

उसने दूसरा गड्स उसने सोचा , एक पहर बीत गया है । कुछ खाना – पीना खा लेना चाहिए , लेकिन तभी मन ही मन में खयाल आया , ‘ आ तो तीन पहर बाकी है । 

इतनी अच्छी ज़मीन हाथ से जाने देना मूर्खता होगी । ‘ अब उसने जूते भी उतार दिए और तेज़ी उ बढ़ने लगा । उसका शरीर पसीने से लथपथ हो गया । प्यास के मारे उसका बुरा हाल था । थोड़ा ठहरकर उसने पानी पिउ और बाईं ओर बढ़ने लगा , लेकिन उसके कदम भारी हो रहे थे । 

वह बैठ गया । मन हो रहा था कि थोड़ा आराम कर र लेकिन कहीं नींद न आ जाए , इस वजह से लेट नहीं सका । उसने खाना खाया , पानी पिया , तो थोड़ी राहत महसूस हुई! वह फिर से उठ खड़ा हुआ और आगे बढ़ने लगा । दो – तीन किलोमीटर आगे आया होगा कि सूरज नीचे होता दिखाई से पड़ने लगा । 

दीना ने वापस लौटने का निश्चय किया । वह लंबे – लंबे कदम बढ़ाकर लौटने लगा । उसे एक – एक कदम भारी पड़ रहा था । टाँगें जवाब दे रही थी । उसके पैर जगह – जगह छिल गए थे । उसका मन आराम करने को हो रहा था लेकिन यह संभव नहीं था । 

उसे किसी तरह सूरज ढलने से पहले पहुँचना था । वह पूरे दम से आगे बढ़ रहा था । ने उसने कमीज़ उतारकर फेंक दी । अगर सूरज ढलने से पहले वह नहीं पहुँचा , तो उसकी सारी मेहनत पर पानी फिर तुम जाएगा और सारी रकम जब्त हो जाएगी । यह विचार आते ही वह डरकर काँपने लगा । 

उसकी टाँगे काँप रही थीं । बुश छाती धड़क रही थी , आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा । सूरज प्रतिक्षण ढलता जा रहा था । वह हिम्मत जुटाकर भागने गह लगा । उसे कोलों की आवाजें सुनाई दे रही थीं , जो ज़ोर ज़ोर से आवाज़ लगाकर बुला रहे थे । 

दीना सोच रहा था यस अगर समय पर न पहुँचा , तो लोग हँसेंगे । सूरज धरती से लगा जा रहा था । अब डूबा , तब चल चने डूबा । उसे ज़मीन पर रखी टोपी दिखाई पड़ने लगी । कोल और सरदार सभी उसे बुला रहे थे । तभी सूरज डूब गया । 

अँधेरा हो गया । ” ओह सारी मेहनत बेकार हो गई । 

” दीना के मुँह से चीख निकल गई । कोल अब भी से उसे बुला रहे थे । दीना ने सोचा – कोल न ऊँचाई पर खड़े हैं , उन्हें सूरज अब भी ची दिखाई दे रहा होगा , बस मुझे नहीं दिखाई दे रहा है । 

उसने पूरी ताकत लगाई । लंबा कदम बढ़ाकर टोपी छू ली और मुँह के बल जा गिरा । ” वाह खूब रही ! वाह खूब रही ! 

” सरदार चिल्लाया , ” वाह ! तुमने कितनी ज़मीन ले ली ? ” यार से दीना का साथी दौड़कर आया । उसने दीना को उठाना चाहा , लेकिन दीना तो मर चुका था ।

 कोल हँसने लगे । दीना के साथी ने फावड़ा उठाया । उसके लिए कब्र खोदी । कुल दो मीटर जगह काफी थी । सरदार के मुँह से निकला– “ बस ! आखिर कितनी जमीन ! “

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