Hindi story: Best Moral Story in Hindi | Writing Paper Best Moral Story in Hindi

Hindi story: Best Moral Story in Hindi | Writing Paper Best Moral Story in Hindi: Best Moral Story in Hindi (Writing Paper) : प्रस्तुत पाठ में आधुनिक कागज़ उद्योग की कहानी का क्रमानुसार वर्णन किया गया है । पाठ में पाँच हजार वर्ष लिखने हेतु घास को गलाकर फलक बनाने के प्रयासों से आधुनिक कागज़ तक की यात्रा का वर्णन रोचक ढंग प्रस्तुत किया गया है । भोजपत्र , चर्मपत्र एवं हस्त उद्योग से संबंधित जानकारी प्रस्तुत की गई है । 

Best Moral Story in Hindi (Writing Paper)

आजकल कागज़ एक सुलभ पदार्थ है , जो लिखने हेतु तथा पुस्तकों के प्रकाशन में प्रयुक्त होता है । परंतु सत्रहवीं शताब्दी तक यह एक दुर्लभ पदार्थ था । आओ , कागज़ के आविष्कार के इतिहास के विषय में जानकारी प्राप्त करे । 

कागज़ के विषय में विचार करते समय हमें लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व के विश्व की ओर वापस जाना पड़ेगा तथा मिस्र देश की नील नामक नदी की घाटी की यात्रा करनी होगी । 

इस घाटी की पंकल भूमि में एक लंबी घास उपजती थी , जिसे वहाँ के निवासी काटकर नदी के जल में डाल देते थे , ताकि वह मृदु हो जाए । उस मृदुल घास को एक चौकोर चटाई के रूप में छाकर खूब कूटा जाता था , ताकि वह चादर के समान पतली होकर एक समतल फलक का रूप ले ले । 

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तत्पश्चात् इस फलक को धूप में सुखाकर लिखने के लिए प्रयोग में लाया जाता था । इस फलक रूपी कागज़ का प्रयोग मिस्र , यूनान तथा रोम आदि देशों में होता था । जहाँ तक भारत का संबंध है , हमारे ऋषि – मुनि मंत्र , जंत्र तथा धार्मिक पुस्तकें लिखने के लिए भोजपत्र का प्रयोग करते थे । 

पश्चिमी मध्य एशिया तथा यूरोप के देशों में भेड़ – बकरी तथा गाय की खालों को साफ़ करके चर्मपट बनाया जाता था तथा उसे लिखने हेतु प्रयोग में लाया जाता था । ऊपर दिए गए चित्रों में भोजपत्र पर लिखा एक जंत्र तथा चर्मपट पर अंकित एक लेख दिखाए गए हैं ।

 वर्तमान काल में प्रयुक्त होने वाले कागज़ की कहानी सर्वथा भिन्न है । इस कहानी का संबंध मिस्र से न होकर चीन से है , जहाँ इसका आविष्कार 105 ई ० में हुआ था । इसके आविष्कारक का नाम था काई लुन ( Cai Lun ) जोकि चीन के तत्कालीन सम्राट के रनिवास में सेवारत था । उसने शहतूत के पत्तों को कूट – कूटकर उनका गूदा बना लिया तथा उसे एक पट का रूप देकर लेखन हेतु लिया । 

कालांतर में कागज़ बनाने के लिए पुराने वस्त्र , सन नामक पौधे का छिलका तथा मछली पकड़ने के पुराने जाल भी प्रयोग में लाए जाने लगे । 

लगभग 200 वर्ष तक चीन का कागज़ – उद्योग देश से बाहर नहीं जा सका । तीसरी शताब्दी में वियतनाम तथा तिब्बत मार्ग होता हुआ यह उद्योग एशिया महादवीप के दक्षिण – पूर्वी भाग में फैल गया । 

अरब देशों के व्यापारी भारत आते रहते थे । फलतः उन्हें भी इस उद्योग के विषय में पता चल गया तथा इराक की राजधानी बगदाद , मिस्र की काहिरा तथा तुर्किस्तान की राजधानी दमिश्क नामक नगरों में कागज़ बनाने के हस्त – उद्योग का काम होने बारहवीं शताब्दी में जब मध्य एशिया के मुसलमानों ने स्पेन पर अधिकार कर लिया , तो कागज़ – उद्योग यूरोपीय देशों जा पहुँचा । 

वहाँ अभी तक खालों को साफ़ कर बनाए गए चर्मपट ही कागज़ के रूप में प्रयुक्त किए जाते थे । परंतु यह सामग्री बहुत महँगी पड़ती थी । तत्कालीन लेखकों के अनुसार बाइबल की एक हस्तलिखित प्रति के लिए 300 भेड़ों की खाले प्रयोग में जाती थीं । मानव विकास – पथ पर अग्रसर होने के साथ – साथ लेखन कार्य बढ़ता जा रहा था तथा कागज़ सदृश सामग्री की माँग – प्रतिदिन वृद्धि हो रही थी । 

अतः यूरोपीय देशों वैज्ञानिक ऐसी सामग्री का आविष्कार करने के प्रयास गए । सन् 1450 में जब जर्मन देश के निवासी जोहैन्नस गुटनबर्ग ( Johannnes Gutenburg ) ने मुद्रण कला का कर लिया , तो कागज़ जैसी सामग्री की माँग में अप्रत्याशित वृद्धि होने लगी । 

कहते हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है । वैज्ञानिक कागज़ के आविष्कार में जी – जान से जुट गए । कागज़ बनाने के लिए फटे पुराने सूती कपड़ों , लिनन तथा पुरानी रूई का प्रयोग होने लगा । प्रयास सतत चलता रहा , अंततः कागज़ बनाने के लिए नर्म लकड़ी के गूदे का प्रयोग किया जाने लगा । 

अठारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में फ्रांस के निवासी निकोलस लुई रॉबर्ट ( Nocholas Louis Robert ) ने कागज़ बनाने की पहली मशीन का आविष्कार कर लिया । इस मशीन से असीमित लंबाई युक्त कागज की पट्टी बनाना संभव हो गया , जिसे थानों ( rolls ) के रूप में लपेटा जा सकता था । इस मशीनी कागज़ ने उद्योग से बने कागज़ का अंत कर दिया । 1850 ई ० तक कागज़ बनाने के लिए मुख्यतः लिनन , पुरानी रूई तथा फटे – पुराने सूती कपड़ों का ही प्रयोग होता रहा । 

कागज की माँग के उत्तरोत्तर वृद्धि के कारण एक नए पदार्थ के प्रयोग की खोज की गई और वह पदार्थ था सकड़ी का गूदा । यह गूदा नर्म छाल वाले पेड़ों से प्राप्त किया जाता है । 

ऐसे पेड़ों को गिराकर उनकी लकड़ी को छारे – छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है । फिर उनमें सोडियम सल्फेट नामक रसायन मिलाया जाता है तथा भारी दबाव के प्रभाव अलग करके उनका गूदा प्राप्त कर लिया जाता है ।

इस गूदे में से अनावश्यक पदार्थों को अलग कर लिया जाता है तथा शुद्ध गूदे के रंग – काट के द्वारा श्वेत बना लिया जाता है । यह सारा मिश्रण एक तंग नाली के मार्ग से होकर एक सतत गतिमान फलक पर पहुँच जाता है । फलतः गृह का सारा पानी निकलकर बह जाता है तथा गूदे की शीट को सुखा लिया जाता है ।

 यही नहीं , इस प्रकार तैयार कागज़ को अलग – अलग रंग भी दे दिए जाते हैं तथा इसके तल को चिकना बना दिया जाता है । अब कागज़ बनाने के लिए अनेक प्रकार के रेशेदार पदार्थों का प्रयोग किया जा रहा है । 

इन पदार्थों को मृदु बनाकर गूदे का रूप दे दिया जाता है तथा फिर रंग – काट का प्रयोग करके गूदे को श्वेत रंग का बना दिया जाता है । 

तत्पश्चात् कुछ रसायनों के प्रयोग द्वारा इसे कम – से – कम स्याही का चूषण करने योग्य कर दिया जाता है और इसके तल को चिकना भी बना दिया जाता है । 

कागज़ बनाने में प्रयोग होने वाले लकड़ी के गूदे तथा अन्य रेशेदार पदार्थों की सुलभ प्राप्ति के कारण पुस्तकों , पत्र – पत्रिकाओं तथा समाचार पत्रों की बाढ़ सी आ गई है । परंतु आज के कागज़ तथा प्राचीन कागज़ सदृश सामग्री में एक अंतर स्पष्ट होकर सामने आया है । 

वह अंतर यह है कि लकड़ी के गूदे से तैयार होने के कारण आज के कागज़ की आयु अत्यंत सीमित है । यह कुछ ही वर्षों में पीला पड़ जाता है , जबकि प्राचीन पदार्थ ( भोजपत्र , चर्मपट आदि ) इस दोष से रहित हैं ।

 वे सैकड़ों वर्षों से ज्यों – के – त्यों सुरक्षित पड़े हुए हैं , परंतु वर्तमान कागज इस गुण से विहीन है । फलतः पुस्तकालयों में पड़ी पुस्तकें कुछ ही वर्षों के बाद प्रयोग के योग्य नहीं रहती । मशीनी कागज के गुण निम्नलिखित बातों पर निर्भर करते हैं

 • गूदे का स्तर गूदे को निखारने पर किया गया परिश्रम हुए कागज की जीवन अवधि कागज़ बनाने वाली मशीन की गुणवत्ता तैयार 

● कागज़ के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए कागज़ – उद्योग में वैज्ञानिक खोजें की जा रही हैं । गूदा तैयार करने की नई विधियाँ , संश्लिष्ट ( synthetic ) सामग्री का प्रयोग , दोहरी तारों वाली मशीने तथा गूदा बनाने और कागज़ बनाने की विधियों का कंप्यूटरीकरण , प्रदूषण का नियंत्रण तथा ऊर्जा की बचत के लिए उठाए जाने वाले कदम उदाहरणों के रूप में प्रस्तुत किए जा सकते हैं ।

उद्देश्य: प्रस्तुत पाट का उद्देश्य आजकल के सुलभ पदार्थ कागज़ के सत्रहवीं शताब्दी के दुर्लभ पदार्थ की गाथा को छात्रों तक पहुँचाना है ।

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