[10+book] UPSI Mool Vidhi Book pdf | Mool Vidhi Book for UPSI Download

UPSI Mool Vidhi : भारतीय दण्ड संहिता का यह नवम्‌ संस्करण पूर्णतः नए Covor page, साज-सज्जा व अधुनातन परिवर्तनों को शामिल करते हुए प्रस्तुत किया जा रहा है। इस अंक में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम- 2000 द्वारा अन्तःस्थापित तथा प्रतिस्थापित धारा परिवर्तनों को सम्मिलित करते हुए उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय के महत्त्वपूर्ण विनिश्चयों को भी स्थान दिया गया है।

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पाठ्य सामग्री को और अधिक उपयोगी बनाने की दृष्टि से दण्ड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम त़था दण्ड संहिता के संदर्भ में प्रादेशिक स्तर पर होने वाले कानूनी बदलाव पर खास ध्यान दिया गया है। धारावाही क्रम में लिखी गई ये पुस्तक विशद्‌ टिप्पणियों, उदाहरणों, सारगर्भित विवेचनाओं से युक्‍त है, भाषा-शैली पहले के मुकाबले अधिक सरल व बोधगम्य है |

निःसंदेह देवनागरी लिपि में लिखी ये पुस्तक हिन्दी विधि जगत से जुड़े प्राध्यापकों, प्रतियोगी छात्रों के साथ-साथ न्‍यायालयी कार्यों से संबंध रखने वाले तमाम लोगों के लिए लाभप्रद और बहुपयोगी सिद्ध होगी।

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UPSI Mool Vidhi Book Details

विधि एवं न्याय के क्षेत्र में हिन्दी का अभी तक उचित स्थान न होने का एक प्रमुख कारण इस भाषा में उचित स्तर की टीकाओं का अभाव है। इसलिये इस ओर प्रत्येक अच्छे प्रयास का स्वायत है।

हिन्दी भाषा में दण्ड संहिता पर लिखी गई पुस्तकों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। इनमें कुछ पुस्तकें केवल विधिशास्त्र के विद्यार्थियों के लिये हैं तथा कुछ केवल न्यायालयों के लिये हैं। प्रस्तुत पुस्तक यद्यपि धारावाही क्रम में लिखी गई है, परन्तु वह ऐसी विशद्‌ टिप्पणियों से युक्त है कि जिनसे न केवल छात्रों; ग्राध्यापकों, पुलिस व
अधिकारियों की आवश्यकतायें पूरी होती हैं; बल्कि न्यायालयों और अधिवक्ताओं के लिए भी बहुत उपयोगी है।

पुस्तक को उपयोगी बनाने के लिए लेखक ने वास्तव में बड़ा परिश्रम किया है। किसी भी प्रावधान की व्याख्या करते समय न केवल उस सम्बन्ध में उपलब्ध प्राचीन भारतीय और ब्रिटिश विधि तथा उच्च और उच्चतम न्यायालयों की व्यवस्थाओं

(शा!एह&) का उचित प्रसंग में उल्लेख और उनका विशद्‌ विवेचन करके निर्णय के आधार बताये हैं, बल्कि उसको विधिशास्त्रीय ढंग से प्रत्येक द्रष्टिकोण से स्पष्ट करने का अच्छा प्रयास किया है।

दण्ड संहिता में कई ग्रमुख्न प्रश्न न्यायालयों व विधिशास्त्रियों द्वारा विशद्‌ विवेचन की हमेशा अपेक्षा करते रहेंगे। उनमें धारा 34 के सामान्य आशय, धारा 4] का सामान्य उद्देश्य साधारण अपवादों, अभियुक्त को प्रतिरक्षा के अधिकार आपराधिक मानव वष्च व हत्या प्रमुख हैं। लेखक ने इन विषयों की बारीकियों का पर्याप्त विश्लेषण किया है।

म॒त्युदण्ड की संवैधानिकता के सम्बन्ध सें उच्चतम न्यायालय के विभिन्‍न निर्णयों, जैसे- जगमोहन सिंह ब. उत्तर प्रदेश: राजेद्र प्रसाद ब. उत्तर प्रदेश तथा बचन सिंह ब. पंजाब राज्य की बड़ी ही विद्वत्तापूर्ण विवेचना की है।

UPSI Mool Vidhi Imp Low :

धारा 22. जंगम सम्पत्ति

धारा 23. सदोष अभिलाभ
धारा 24. बेईमानी से”
धारा 25. कपटप्‌र्वका
धारा 26. विश्वास करने का कारण ..
धारा 27. पत्नी) लिपिक या सेवक के कब्जे में सम्पत्ति
धारा 28. कूटकरण
धारा 29. दस्तावेज
29-क. इलैक्ट्रानिक अभिलेख
धारा 30. मृत्यवान प्रतिभ्रति
धारा 31. विल
धारा 32. कार्यों का निर्देश करने वाले शब्दों के अन्तर्गत अवैध लोप आते हैं.
धारा 33. कार्य, लोप’
धारा 34. सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य

धारा 35. जबकि ऐसा कार्य इस कारण आपराधिक है कि वह आपराधिक ज्ञान या आशय से किया गया है

धारा 36. अंशतः कार्य द्वारा और अंशतः लोप द्वारा कारित परिणाम.

धारा 37. किसी अपराध को गठित करने वाले कई कार्यों में से किसी एक को करके सहयोग करना

धारा 38. आपराधिक कार्य में सम्पक्त व्यक्ति विभिन्‍न अपराधों के दोषी हो सकेंगे
धारा 39. स्वेच्छया’

धारा 40. अपराध”

धारा 41. विशेष विधि’

धारा 42. स्थानीय विधि’

धारा 43. अवैध, करने के लिए वैध रूप से आबर्दधा
धारा 44. क्षति

धारा 45. जीवन

धारा 46. म्रत्यु

धारा 47. जीवजन्तु

धारा 48. जलयान

धारा 49. वर्ष, मास

धारा 50. धारा

धारा 51. शपथ

धारा 52. सद्भावपूर्वका
52-क. संश्र्या


अध्याय 3


दण्डों के विषय में

धारा 53. दर्ण्डा

53-क. निवरसन के ग्रति निर्देश का अर्थ लगाना

धारा 54. म्र॒त्यु दण्डादेश का लघुकरण

धारा 55. आजीवन कारावास के दण्डादेश का लघुकरण

55-क. समुचित सरकार की परिभाषा

धारा 56. यरोपियों तथा अमरीकियों को कठोर श्रम कारावास का दण्डादेश दस वर्ष से अधिक किन्तु जो आजीवन कारावास से अधिक न हो; दण्डादेश के सम्बन्ध में परन्तुक [निरसित]

धारा 57. दण्डावधियों की भिनन्‍नें

धारा 58. निर्वासन से दण्डादिष्ट अपराधियों के साथ कैसा व्यवह्वार किया जाए जब
तक वे निर्वासित न कर दिए जाएं [निरसित]. .

धारा 59. कारावास के बदले निर्वासन [निरसित]

धारा 60. दंडादिष्ट कारावास के कतिपय मामलों में सम्पूर्ण कारावास या उसका कोई
भाग कठिन या सादा हो सकेगा

धारा 61. संपत्ति के समपहदरण का दण्डादेश [निरसित]

धारा 62. मत्यु, निवासिन या कारावास से दण्डनीय अपराधियों की बाबत संपत्ति का
समपहरण [निरसित]

धारा 63. जुमनि की रकम
धारा 64. जुर्माना न देने पर कारावास का दण्डादेश

धारा 65. जब कि कारावास और जुर्माना दोनों आदिष्ट किये जा सकते हैं, तब
जुमाना न देने पर कारावास की अवधि

धारा 66. जुर्माना न देने पर किस भाँति का कारावास दिया जाए . .
धारा 67. जुर्माना न देने पर कारावास; जब कि अपराध केवल जुमनि से दण्डनीय हो
धारा 68. जुमना देने पर कारावास का पर्यवसान हो जाना

धारा 69. जुमनि के आनृुपातिक भाग के दे दिये जाने की दशा में कारावास
का पर्यवसान

धारा 70. जुमनि का छह वर्ष के भीतर या कारावास के दौरान में उद्ग्रहणीय होना:
सम्पत्ति को द्ययित्व से म्॒त्यु उन्मुक्त नहीं करती

धारा 71. कई अपराधों से मिलकर बने अपराध के लिए दण्ड की अवधि

धारा 72. कई अपराधों में से एक के दोषी व्यक्ति के लिए दण्ड जब कि निर्णय में यह
कथित है कि यह सन्देह है कि वह किस अपराध का दोषी है

धारा 73. एकान्त परिरोध

धारा 74. एकान्त परिरोध की अवधि

धारा 75. पूर्व दोषसिद्धि के पश्चात्‌ अध्याय 42 या अध्याय ॥7 के अधीन कतिपय
अपराधों के लिये वर्धित दण्ड

अध्याय 4

साधारण अपवाद


धारा 76. विधि द्वारा आबद्ध या तथ्य की भूल के कारण अपने आप को विधि द्वारा
आबद्ध होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
धारा 77. न्याथिकतः कार्य करते हुए न्यायाधीश का कार्य, . .
धारा 78. न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य ..

धारा 79. विधि द्वारा न्‍्यायानुमत या तथ्य की भूल से अपने को विधि द्वारा न्‍्यायानुमत
होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया ग्रया कार्य

धारा 80. विधिप्‌र्ण कार्य करने में दुर्घटना

धारा 81. कार्य, जिससे अपहानि कारित होना सम्भाव्य है, किन्तु जो आपराधिक
आशय के बिना और अन्य अपहानि के निवारण के लिये किया गया है

धारा 82. सात वर्ष से कम आयु के शिशु का कार्य

धारा 83. सात वर्ष से ऊपर किन्तु बारह वर्ष से कम आयु के अपरिपक्व समझ के शिशु का कार्य

धारा 84. विक्ृत चित्त व्यक्ति का कार्य

धारा 85. ऐसे व्यक्ति का कार्य जो अपनी इच्छा के विरुद्ध मत्तता में होने के कारण निर्णय पर पहुँचने में असमर्थ है

धारा 86. किसी व्यक्ति द्वारा; जो मत्तता में है, किया गया अपराध जिसमें विशेष आशय
या ज्ञान का होना अपेक्षित है

धारा 87. सम्मति से किया गया कार्य जिससे म्र॒त्यु या घोर उपहति कारित करने का आशय न हो और न उसकी सम्भाव्यता का ज्ञान हो

धारा 88. किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सम्मति से सद्भावपर्वक किया गया कार्य
जिससे म्र॒त्यु कारित करने का आशय नहीं है

धारा 89. संरक्षक द्वारा या उसकी सम्मति से शिश या उन्मत्त व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावप्‌र्वक किया गया कार्य

धारा 90. सम्मति; जिसके सम्बन्ध में यह ज्ञात हो कि वह भय या भ्रम के अधीन दी गई है

धारा 91. ऐसे कार्यों का अपवर्जन जो कारित अपहानि के बिना भी स्वतः अपराध हैं

धारा 92. सम्मति के बिना किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सदभावषूर्वक
किया गया कार्य –

धारा 93. सदभावपूर्वक दी यई संसूचना

धारा 94. वह कार्य जिसको करने के लिए कोई व्यक्ति धमकियों द्वारा विवश
किया गया है

धारा 95. तुच्छ अपहानि कारित करने वाला कार्य
प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के विषय में

धारा 96. प्राइवेट प्रतिरक्षा में की गई बातें ..
धारा 97. शरीर तथा सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार ..

धारा 98. ऐसे व्यक्ति के कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार जो
विक़ृत चित्त आदि हो

धारा 99. कार्य, जिनके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है

धारा 100. शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार म्रत्यु कारित
करने पर कब होता है

धारा 101. कब ऐसे अधिकार का विस्तार म्रत्यु से भिन्‍न कोई अपहानि कारित
करने तक का होता है

धारा 102. शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारम्भ और बना रहना

धारा 103. कब सम्पत्ति की ग्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार म्र॒त्यु कारित
करने तक का होता है

धारा 104. ऐसे अधिकार का विस्तार म्रत्यु से भिन्‍न कोई अपहानि कारित करने तक
का कब होता है

धारा 105. सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का ग्रारस्भ और बना रहना

धारा 106. घातक हमले के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार जब कि निर्दोष
व्यक्ति को अपहानि होने की जोखिम है

अध्याय 5


डुष्प्रेरण के विषय में


धारा 107. किसी बात का दुष्प्रेरण
धारा 108. दुष्प्रेरक
108-क: भारत से बाहर के अपराधों का भारत में दुष्प्रेरण

धारा 109. दुष्प्रेणण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित कार्य उसके परिणामस्वरूप किया जाय और जहाँ कि उसके दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं है

धारा 110. दुष्प्रेणण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्ररके के आशय से भिन्न
आशय से कार्य करता है

धारा 111. दुष्प्रेक का दायित्व जब एक कार्य का दुष्प्रेण किया गया है और उससे
मिन्‍न कार्य किया गया है

धारा 112. दुष्प्रेक कब दुष्प्रेरित कार्य के लिये और किये गये कार्य के लिये आकलित
दण्ड से दण्डनीय है

धारा 113. दुष्प्रेरित कार्य से कारित उस प्रभाव के लिए दुष्प्रेक का दायित्व जो दुष्प्रेरक
द्वारा आशयित से भिन्‍न हो

धारा 114. अपराध किये जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति ..

धारा 115. मत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण–यदि अपराध
नहीं किया जाता

धारा 116. कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण- -यदि अपराध न किया जाय यदि दुष्प्रेक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है, जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना हो

धारा 117. लोक साधारण द्वारा या दस से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध किये जाने का दुष्प्रेरण

धारा 118. म्त्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना

धारा 119. किसी ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना का लोक सेवक द्वारा छिपाया जाना; जिसका निवारण करना उसका कर्तव्य है

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